(घुघूती बासूती के साथ डॉ. बेजी की अंतरंग बातचीत)

बेजी के लेखन में संवेदनशीलता और बुद्धिमता का बेजोड़ समन्वय मिलता है। उनकी कविता जीवंत अनुभूतियों को हू-ब-हू शब्दबद्ध कर सकने की कला की अनोखी मिसाल है। उनका गद्य इतना पारदर्शी है कि उसमें लेखिका के चिदाकाश पर उमड़ते-घुमड़ते विचारों के बादलों की गति और दिशा को साफ देखा जा सकता है। उनकी गूढ़ बातें भी इतनी स्पष्ट होती हैं कि उन्हें समझने में भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं रहती। उनके परिपक्व और आनंदप्रद लेखन को देखकर अक्सर उनके बारे में जानने की उत्सुकता होती है। पत्रिका के लिए घुघूती बासूती के साथ एक सहेली की तरह बातचीत करते हुए बेजी ने अपने जीवन और लेखन से जुड़े कुछ अंतरंग पहलुओं का खुलासा किया है।

घुघूती बासूती- बेजी जी, हम सब आपको पढ़ते रहे हैं और आपके लेखन के कायल हैं। अब हम आपके बारे में जानना चाहते हैं। अपने बारे में कुछ बताइये। आपने लिखना कब शुरू किया?

बेजी - आप मुझसे उम्र और अनुभव दोनों में बड़ी हैं…बेजी ही बुलाएं….वैसे भी, मेरी सहेली तो कहती थी….तेरा नाम बे ही होगा, ‘जी’ हम इज्जत से लगा देते हैं। लिखना पता नहीं कब शुरु किया…..लिखा हुआ संजोकर रखना बारहवीं कक्षा के बाद शुरु किया। हमेशा से मुझे लोगों के विचारों, भावनाओं और उन्हें दिशा देने वाले दर्शन में दिलचस्पी रही। शायद इसलिए जिसे भी जानती थी उसे ख़त लिख देती। माँ जब नाराज़ हो जाती….उनके सामने भी अपना पक्ष लिख कर ही रखती। क़लम मेरे दिल, दिमाग़ और रूह के बहुत क़रीब है।
घुघूती बासूती- अपना चिट्ठा बनाने का विचार कैसे आया?

बेजी - जो परिवार मुझे मिला था, बहुत सुंदर था। किन्तु साहित्य में किसी की भी रुचि नहीं थी। हर कही-अनकही बात अपने भाई को सुनाया करती थी। वही मुझे सबसे ज़्यादा समझता था। शादी के बाद लिखती थी तो भी लिखा हुआ सँभालना छोड़ दिया था। पिछले साल मेरे जन्मदिन पर भाई ने मेरा चिट्ठा शुरु किया….मेरी कठपुतलियाँ….यह नाम भी उसी ने दिया….। बस शुरु हो गया चिट्ठा।
घुघूती बासूती - आपको लिखने की प्रेरणा किन व्यक्तियों और घटनाओं से मिलती है ?

बेजी - किसी व्यक्ति या घटना से प्रेरणा नहीं मिलती….कोई व्यक्ति या घटना जब मेरे जज़्बात और विचार को झकझोर देती है….मेरी सोच, मेरा व्यक्तित्व बदल देती है….मुझे मुझसे परिचित कराती है….कोई अहसास बन जाती है…तो अपने आप मन शब्दों में उतार देने को आतुर हो जाता है। कभी-कभार खुद की तलाश में ऐसे पड़ाव मिल जाते हैं कि दो घड़ी रुककर अपने अस्तित्व के नीचे साँस लेने का मन करता है…क़लम के साथ।

घुघूती बासूती - आप लेखन को कितना समय देती हैं?

बेजी - नहीं… इतनी अनुशासित नहीं हूँ…..जब मन में आता है लिखती हूँ….नहीं मन करता तो नहीं लिखती।

घुघूती बासूती - आपको कैसा साहित्य पसन्द है ? आपको हिन्दी के कौन से लेखक अधिक पसन्द हैं ?

बेजी - कैसा भी….पढ़ना शुरु करो और खुद ही लिखे शब्द से बँध जाओ….तो आगे भी पढ़ती चली जाती हूँ। नहीं तो कहीं भी छोड़ देती हूँ। चूंकि हिन्दी में बहुत कम पढ़ा है…..इतने कम में से किसी का चयन करना बेवक़ूफ़ी होगी।

घुघूती बासूती - खुद की लिखी कौन-सी रचना आपको सबसे प्रिय है? कृपया उसका लिंक भी दीजिये।
बेजी - खुद की रचना अपने बच्चों जैसी होती है….सभी पसंद हैं…सभी के साथ कुछ विचार और भाव जुड़े हैं…सभी दिल के क़रीब हैं। फिर भी, मुझे अपनी यह और यह रचना खास तौर पर पसंद हैं।

घुघूती बासूती - बेजी, आप डॉक्टर हैं , पत्नी हैं, माँ हैं और लेखिका भी। आप इतने सारे दायित्व कैसे निभा लेती हैं ? कभी आपको दिन के चौबीस घंटे कम लगते हैं?
बेजी - पता नहीं, क्या और कितना निभा पाती हूँ। पर कोई ऐसा दिन नहीं आया जब बैठकर सोचा हो, “अब क्या करूँ?” दिन भी छोटा लगता है और रात भी। खाली बैठना भी मेरा शौक है…जब इसके लिये समय नहीं मिलता तो चिड़चिड़ी हो जाती हूँ।

घुघूती बासूती- इन सबके सिवाय आपके और भी कोई शौक़ हैं?

बेजी- हाँ, मुझे खेलना बहुत अच्छा लगता है। गिल्ली डंडा, सोने की चिड़िया, सुरंग, लंगड़ी पौव्वा सभी पसंदीदा खेलों में शामिल था। आज भी टेबल टेनिस और बैडमिन्टन खेलती हूँ। मुझे पेंटिंग करना भी पसंद है…..लेकिन अब काफ़ी समय हो गया पेंटिंग किए हुए। खाना बनाना और चाट खाना भी बेहद पसंद है।

घुघूती बासूती - आप बेहद संवेदनशील लेखिका हैं , क्या आप बचपन से ही ऐसी हैं? अपने बचपन के बारे में कुछ बताइये।

बेजी - हाँ, बचपन से ही काफी जज़्बाती हूँ। जब छोटी थी तब मदर टेरेसा बनना चाहती थी। जब समझ में आया कि मदर टेरेसा तो नहीं, चाहूं तो नन जरूर बन सकती हूँ…तब ख़्याल छोड़ दिया। प्रेमिका, पत्नी, माँ….सब बनना चाहती थी….जीवन को पूर्णतया जीना चाहती थी। रंग, ख़ुश्बू, साज़, संगीत सब पसंद है।

बचपन राजस्थान के रावतभाटा की विद्युत कॉलोनी में बीता। पड़ोसी पंजाबी थे, सामने राजस्थानी रहते थे। मंदिर, गिरिजाघर और गुरुद्वारा सभी जगह भागकर पहुँच जाते थे। कोटा में दशहरे का मेला, चारबुजा में जन्माष्टमी का, होली में जंगल से लकड़ी काट कर लाना, दीवाली में लीपना, दुर्गा पूजा और गणपति विसर्जन.. सर पर लकड़ी की गठरी और घुटनों से थोड़े मुड़े हुए पाँव….पगड़ी बाँधे हुए दूधवाले…..पत्तों में बँधे मावे की खुशबू….शीशे के बक्से में अलग-अलग रंगों के बुढ़िया के बाल….बर्फ़ के गोले….रंग-बिरंगी अंटियाँ।
माँ और पिताजी दोनों नौकरी करते थे। शुरु में कुछ नौकर थे जिन्हें भगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी….बचपन में बहुत शैतान थी। भाई के दोस्त मेरे भी दोस्त थे। सुबह से शाम तक खेलना और रात को कभी बिजली चली जाए तो तारे गिनना। हाँ…बच्चे तब भी पसंद थे…नवजात शिशु से लेकर अपनी उम्र तक सभी।

घुघूती बासूती - अपनी पढ़ाई, अपने काम और अपने पति के बारे में कुछ बताइए।

बेजी - मैंने सूरत, साउथ गुजरात यूनिवर्सिटी से एम.डी. (बाल चिकित्सा) की डिग्री ली है। दो साल जगड़िया सेवा रुरल में कार्यरत थी। इसके बाद भरूच सिविल अस्पताल में पदस्थ रही। उसके बाद से दुबई में हूं।

जयसन मेकैनिकल इंजीनियर हैं। पिछले चौदह वर्षों से अलग-अलग विद्युत कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं और फिलहाल दुबई में कार्यरत हैं। जयसन से अपने घर पर ही मिली। वह केरल से पहली बार शहर आये थे। काकरापार में माँ, पिताजी और जयसन साथ ही थे। कुछ वर्षों दोस्ती, फिर प्यार और फिर सबकी सम्मति से विवाह। जयसन से जब मिली थी तब उनकी हिन्दी बहुत कमज़ोर थी और मेरी मलयालम। अब दोनों काफ़ी कुछ सुधर चुके हैं। लेकिन मुझे मलयालम और इन्हें हिन्दी साहित्य समझने के लिये एक-दूसरे की ज़रूरत है। जयसन काफ़ी परिपक्व हैं और मुझमें बचपना कुछ अधिक है। मैं साइन कर्व की तरह हूं और यह उसके बेसलाइन की तरह।

जोयल और कैतरीन दो बच्चे हैं, दोनो बहुत प्यारे हैं। मुझसे बहुत कम शैतान….शायद पापा पर गये हैं।

घुघूती बासूती- आप बच्चों की डॉक्टर हैं। क्या आपके काम में कभी कोई ऐसी घटना घटी जिसे आप कभी नहीं भुला पाएँगी? उसके बारे में हमें भी बताइये।
बेजी - पारुल….यही नाम था उसका। रेसिस्टेन्ट ट्युबरकुलोसिस से पीड़ित थी। माँ विधवा थी और पारुल एकलौती औलाद। हर दवा उस पर बेअसर थी। मैं रेसीडेन्सी के पहले साल में थी। तक़रीबन 11 साल की उम्र….माँ-बेटी में गहरा रिश्ता था। यही उनकी दुनिया थी। पारुल हमारे हाथ से छूटती जा रही थी। जूनियर डाक्टरों में पारुल की जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी। दिन-ब-दिन उसकी बिगड़ती हालत…और उसकी माँ की बेबसी….समझ नहीं आता था कि कैसे कहें, हम कुछ नहीं कर सकते।हर रोज़ साढ़े बारह बजे दोनों माँ-बेटी खाना खाते थे। कुछ दिनों से पारुल, साँस की तक़लीफ़ और ऑक्सीजन पर होने की वजह से खा नहीं पा रही थी। मां एकदम टाइम पर खाने का कहतीं थीं। उस दिन बारह बजे पारुल बोली, ” माँ खाना खा लो”। सुबह से ही पारुल कुछ अलग-सी लग रही थी। नहीं…उसकी हालत में रेकार्ड करने जैसा कुछ अलग नहीं था…कुछ मेरी तरफ उसका देखने का तरीक़ा था…मैं उससे नज़र नहीं मिला पा रही थी…..उसे देख मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं यह लड़ाई हार रही थी। उसकी माँ हैरान थी…. “बारह ही बजे हैं बेटा” ….लेकिन बेटी ने कहा- “नहीं, तू खा ले”। बेटी की ज़िद के सामने उसकी माँ भी परेशान थी…”अब आज क्या खास है?” लेकिन पारुल तब तक नहीं मानी जब तक माँ ने खाना नहीं खा लिया। पारुल बोली- “अब मेरे पास बैठ”। अचानक ही पारुल की साँसें और तेज़ हुईं…फिर धीमी होने लगी….पारुल बेहोश हो चुकी थी। मैं कोशिश कर रही थी….पर जानती थी कि हार चुकी हूँ….पारुल के फेफड़े जवाब दे चुके थे। पारुल अपनी माँ का ख़्याल आखिरी बार रखकर बहुत दूर जा चुकी थी।

घुघूती बासूती - क्या आपके जीवन में कोई ऐसा पल आया जिसे आप दोबारा जीना चाहेंगी? हमें बताइए।

बेजी - जयसन से जब मिली थी तभी हमारे आपसी आकर्षण के बारे में जानती थी। 1993 मे मिली, 1995 में पहली बार उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा कि मेरी माँ से पूछे कि क्या अपनी बेटी का हाथ उनको देंगी। माँ ने पूछा था मुझसे लेकिन मैंने यह कहकर मना कर दिया कि जो खुद नहीं पूछ सकता वो भला कैसे सँभालेगा मुझको। माँ ने फिर भी केरल में पूछताछ जारी रखी….फिर निर्णय किया मैं जयसन के लिये ठीक नहीं। दरअसल, जयसन बहुत ग़रीबी में पले-बढ़े थे, सातवीं औलाद…पाँच बहनें….बूढ़े माता-पिता। मेरी माँ के हिसाब से मैं ऐसा रिश्ता ठीक से नहीं निभा सकती थी। मैं बेहद लाड़-प्यार में पली थी, किसी भी तक़लीफ़ से हमें वाकिफ़ नहीं होने दिया था। माँ के हिसाब से जयसन को थोड़ी और समझदार लड़की की जरूरत थी। लेकिन लड़की तो ब्याहनी थी, सो तलाश शुरु हुई। पहली बार कोई लड़का देखने आ रहा था….दोपहर के खाने में। न जाने कैसे जयसन को भनक पड़ गई। वह सुबह ही घर आ गये, मैं उनसे नज़रें चुराती रही। तभी बाहर घंटियों की आवाज़ सुनाई दी। बुढ़िया के बाल… एक मिठाई जो मुंह में लेते ही घुल जाती है, अब भी पसंद थे मुझे। जयसन तुरंत बाहर गये…एक रुपए का पैकेट ख़रीदा और कुछ देर तक अपनी निगाहें मेरी निगाहों से मिलाकर…नज़रों ही नज़रों में कहकर सभी के सामने मेरे हाथों में वो पैकट थमा दिया। जो लड़का मुझे देखने आया था उसे मैं बहुत पसंद आई लेकिन उसकी माँ की शर्त यह थी कि शादी के बाद लड़की आगे नहीं पढ़ सकती। मैने हाँ करने की सोची भी नहीं। आज भी याद आता है वह पल…जयसन के चेहरे पर चलती कश्मकश, मेरी उनसे दीवानेपन की अपेक्षा और उन जैसे गंभीर क़िस्म के इन्सान के हाथ में बुढ़िया के बाल। ऐसे पलों को कितनी भी बार जीने को मैं तैयार हूँ। कुछ दिनों बाद उन्होने मुझसे पूछा, ”क्या मेरी जीवनसाथी बनोगी” और मैं झट तैयार हो गई।

घुघूती बासूती- क्या आपको पुरुषों व स्त्रियों के लेखन में कोई अन्तर महसूस होता है? यदि हाँ तो क्या?
बेजी - अंतर स्वाभाविक है। लेखन में अलग अस्तित्व झलकता है। पुरुष जीवन को गणित की तरह हल करते हैं। बस एक ही हल सही हो सकता है। स्त्री जीवन को साहित्य के पेपर की तरह देखती है। कई हल मुमकिन भी होते हैं और सही भी। बेहतरी की उम्मीद हमेशा होती है। जब पुरुष लिखते हैं तो तथ्य का महत्व बहुत होता है जबकि स्त्री के लेखन में भाव का। पुरुष भाव और कल्पना को भी अक्सर परिभाषित कर देते हैं। स्त्री के लिये परिभाषाओं का अधिक महत्व नहीं होता। पुरुष अक्सर एक निश्चित क्रम में आगे बढ़ते हैं और एक निष्कर्ष तक पहुँचते हैं। स्त्री रास्ते में ही कई बार रुक-रुककर कहीं विचार छोड़ देती है। कहने की जरूरत नहीं है…..जो अपनी सीमाओं को लाँघ कर दोनों दृष्टिकोण का लेखन लिखने में समर्थ होते हैं वे वास्तव में बहुत अच्छा लिखते हैं।

घुघूती बासूती - नारी मुक्ति के बारे में आपका क्या विचार है ? क्या आप अपनी रचनाओं में इस विषय पर कुछ लिखती हैं?

बेजी - नारी को मुक्ति की उतनी ही आवश्यकता है जितनी पुरुष को। दरअसल, नारी को नारी से और पुरुष को पुरुष से मुक्त होने की जरूरत है। बहुत दुख होता है जब लड़कियाँ कोख में ही मार दी जाती है। आवाज़ उठा सकने के पहले आवाज़ जब दबा दी जाती है। एक बार लिखा था इस पर। नारी पर विचार विमर्श…पर यह मेरा पसंदीदा विषय नहीं है। मुझे किसी भी निश्चित विचार और भाव में क़ैद होना पसंद नहीं है। उन्मुक्त रहना पसंद है। ख़ासकर जब मैं लिखती हूँ। जो बंदिशें खुद पर बाकी समय डालती हूँ उन्हें लिखने के दौरान उतार कर लिखती हूँ। जब लिखती हूँ तो खुद से मिलती हूँ और खुद के साथ समय बिताना भी मुझे बहुत अच्छा लगता है।