(लेखक - काकेश)

किसी लेखक के लेखन की समीक्षा करते समय लेखक के परिचय की आवश्यकता होती है, लेकिन अनामदास का परिचय कुछ अलग किस्म का है। अपने चिट्ठे पर पहले उन्होंने अपना परिचय देते हुए लिखा था “कीबोर्ड की खाता हूँ, उसके बिना मन नहीं लगता। हर काम आराम से करता हूँ, बस धीरे-धीरे टाइप नहीं कर सकता”। इससे प्रतीत होता है कि कीबोर्ड के साथ वह कितने सहज हैं, उन्हें कंप्यूटर द्वारा लिखने में ज्यादा समस्या नहीं होती, नहीं तो अमूमन नये (और कई पुराने भी) चिट्ठाकारों की यही शिकायत रहती है कि उन्हें टाइप करने में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसीलिये आजकल कुछ लोग इंक ब्लॉगिंग को भी एक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। कीबोर्ड के साथ यही सहजता उनके लगातार लिखते रहने का एक कारण है। अपने नये परिचय में अनामदास कहते हैं “अनाम को अनाम ही रहने दीजिए। इतना लिख चुका हूँ कि मेरे बारे में आपको कुछ अंदाज़ा हो सके। उससे ज़्यादा जानने योग्य कुछ है भी नहीं।” अपने बारे में जब कभी वह लिखते हैं, तो उनके व्यक्तित्व की कुछ नई परतें पाठकों के सामने खुल कर सामने आ जाती हैं। एक बार ऐसे ही उन्होंने अपने बारे में कुछ खुलासे किए और खुलासा करने से पहले यह बयान दिया “आज मैं सिर्फ़ अपनी बात करूँगा. एक-एक शब्द सच है. मुझे ख़ुद ही पता नहीं है, मैं कहाँ खड़ा हूँ, जो सही लगता है करता हूँ, अपना तर्क ख़ुद बुनता हूँ…उधेड़ता हूँ…बुनता हूँ”… हिंदू हूँ लेकिन बीफ़ बर्गर पसंद है। थोड़ा वामपंथी हूँ लेकिन माओ-स्टालिन का निंदक हूँ। थोड़ा साम्यवादी हूँ लेकिन पूंजी जुटा रहा हूँ। थोड़ा गाँधीवादी हूँ लेकिन माँसाहारी और मदिराप्रेमी हूँ। थोड़ा समाजवादी हूँ लेकिन लोहिया-जेपी के बाद लालू जँचे नहीं। पूरा लोकतंत्रवादी हूँ लेकिन अमरीकी स्टाइल कबूल नहीं है। पक्का अमरीका विरोधी हूँ लेकिन सद्दाम मंज़ूर नहीं था। ईरान समर्थक हूँ लेकिन मुल्लों से चिढ़ है। देशप्रेमी हूँ लेकिन विदेश में रहता हूँ। राष्ट्रवाद का आलोचक हूँ लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन से डर लगता है। आधुनिक हूँ लेकिन वेद-उपनिषद पढ़ना चाहता हूँ। सवर्ण हूँ लेकिन आरक्षण को ग़लत नहीं मानता। चिट्ठा क्यों लिखते हैं अपने चिट्ठा लेखन को वह “द्विवेदी जी के अनामदास से प्रेरित आधुनिक युग के एक भ्रमित व्यक्ति के प्रलाप” की संज्ञा देते हैं। उनके लेखन के प्रेरणा-स्रोत “अनामदास का पोथा” के अनुसार संसार के दुःख-दैन्य ने राजपुत्र गौतम को गृहत्यागी और विरक्त बनाया था, लेकिन तापस कुमार रैक्व को यही दुःख-दैन्य विरक्ति से संसक्ति की ओर प्रवृत्त करते हैं। वह जीवन की विषमताओं को देख कर परेशान हैं — “जिजीविषा है तो जीवन रहेगा, जीवन रहेगा तो अन्नत सम्भावनाएँ भी रहेंगी। वे जो बच्चे हैं, किसी की टाँग सूख गई है, किसी का पेट फूल गया है, किसी की आँख सूज गई है, ये जी जाएँ तो इनमें बड़े-बड़े ज्ञानी और उद्यमी बनने की सम्भावनाएँ है”। इस चिंता में समाधि रैक्व से सध नहीं पाती और वे उद्वग्नि की भाँति उठकर कहते हैं, “माँ, आज समाधि नहीं लग पा रही है। आँखों के सामने केवल भूखे-नंगे बच्चे और कातर दृष्टि वाली माताएँ दिख रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, माँ?” और माँ रैक्व को बताती हैं– “अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक प्रकार का स्वार्थ ही है“। यही वह वाक्य है जो रैक्व की जीवन-धारा बदल देता है और वह समाधि छोड़कर जीवन संग्राम में कूद पड़ते हैं। अनामदास का पोथा इसी जिजीविषा की कहानी है। कुछ ऐसी ही प्रेरणा काम कर रही है हमारे चिट्ठाकार अनामदास के भीतर भी, जो अपने ब्लॉग के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखा रहे हैं। अपने आसपास की चीजों और अपने छ्त्तीस वसंत के अनुभवों के माध्यम से। स्वयं को भाग्यवान मानते हुए एक जगह वह कहते हैं “मैं बहुत भाग्यवान हूँ कि भारत के एक क़स्बे में पैदा हुआ हूँ, महानगर में जवानी के शुरुआती वर्ष गुज़ारे और एक दशक से यूरोप में हूँ, एक बोली और दो भाषाएँ मोटे तौर पर ठीक-ठाक आती हैं, यह अपने-आप में बेहतरीन संयोग है“। वह अपने पहली ही लेख में गहन गंभीर प्रश्न उठाते हैं “मैं अक्सर सोचता हूँ इतने ब्लॉग क्यों लिखे जा रहे हैं, आकाशवाणी के मनचाहे गीत कार्यक्रम में फ़रमाइश भेजकर झुमरी तलैया और बरकाकाना के साथ-साथ अपना नाम भी रोशन करने वाले लोगों में और ब्लॉग लिखने वालों में कितना फ़र्क़ है” या फिर ” यूज़र जेनरेटेड कॉन्टेट की बात हो रही है…लेकिन जिस यूज़र ने जेनरेट किया है उसके अलावा उसमें किसी और की भी रुचि होगी या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है।” वह अपने लेखन के माध्यम से इस तरह के सवाल उठाते हैं और फिर इन सवालों पर अपने जबाब भी बड़े ही संयत ढंग से रखते हैं। अपने ब्लॉगर होने के बारे में वह कहते हैं. “ब्लॉगर के कोई तय दायित्व नहीं हैं, जो एक आनंददायक स्थिति है। आप स्वांतः सुखाय लिख सकते हैं, दिल खोलकर, दिमाग़ खोलकर और बंद करके भी लिख सकते हैं। चिट्ठाकार के पास गर्व करने की वजहें हो सकती हैं, शर्म करने की नहीं।” भाषा-शैली अनामदास भाषा की दृष्टि से बेजोड़ कलाकार हैं। उनकी भाषा सरल और सुबोध है। गूढ़ विषयों पर भी उनकी भाषा संयत होती है और विषय को स्पष्ट करते हुए चलती है। उनका शब्द चयन बहुत ही शक्तिशाली और सुव्यवस्थित है। वह भाषा के मामले में आम बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग करते हैं, इस दौरान यदि उर्दू या अंग्रेजी के शब्द भी आयें तो उससे परहेज नहीं करते।

  • “यूज़र जेनरेटेड कॅन्टेट की बात हो रही है…लेकिन जिस यूज़र ने जेनरेट किया है….”
  • “दुनिया के सभी धर्मों की एक बात समान है — आत्मा है और परमात्मा है. बाक़ी सब डिटेल है.”
  • आस्तिकों को भी मानना पड़ता है कि ‘प्रभु की माया है’. ऐसे में अगर सिस्टम एरर का रेट 0.5 प्रतिशत …”
  • “यानी ईश्वरप्रदत्त विवेक के हिसाब से कर्म हम करें, कई जन्मों तक उसके फल भी हम ही भोगें, वह हर जन्म में विवेक की वोल्टेज फ्लकच्युयेट करता रहे और उसकी पूजा भी जारी रहे”

सामाजिक सरोकार अनामदास वैसे तो हर मुद्दे पर अपने तार्किक रूप में उपस्थित रहते हैं लेकिन वह उन सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी बात रखते हैं, जिन पर अक्सर लोगों का ध्यान नहीं जाता। जब एक रात उनको अपने पुत्र के पैर दबाने पढ़ते हैं तो उन्हें अपने बूढ़े पिता की याद आ जाती है। “मगर कल रात जब अपने बेटे के पैर दबाते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं अपने पिता के ही पैर दबा रहा हूँ तो सचमुच लगा कि यह पितृऋण ही तो है जो मैं चुका रहा हूँ। मेरे पिता ने मेरे पैर दबाए, मेरा बेटा शायद मेरे पैर कभी नहीं दबाएगा। लेकिन अपने बेटे के पैर नहीं दबाएगा इसके आसार कम ही हैं। यह शायद पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली मानवता की सेवा है जो ऊपर से नीचे की ओर चलती है, शायद ही कभी नीचे से ऊपर जाती है। काश ऐसा नहीं होता।” ये समाज की उस प्रथा पर चिंता है जहां हम अपने बच्चों को तो अच्छी से अच्छी सुविधा उपलब्ध कराने के लिये तत्पर हैं पर अपने बूढ़े होते माँ-बाप को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं। इसी तरह वह पुराने शब्दों की असमय मृत्यु पर भी चिंतित होते हैं। वह कहते हैं - “ऐसा कहा गया है कि शब्द ब्रह्म है। मेरे लिए तो रोज़ी-रोटी, लोटा-लंगोटी है शब्द। शब्द मर रहे हैं, मैं चिंतित हूँ. मैं चाहता हूँ आप भी हों। शब्द कोई आज नहीं मर रहे, हमेशा से मरते और जन्मते रहे हैं शब्द। मौत दुख की वजह हो सकती है, चिंता की नहीं। चिंता महामारी की होती है, यह महामारी ही तो है। मुझे एक विचित्र-सा डर है कि जिन शब्दों की मदद से मैं अपनी बात कहता हूँ, अगर एक-एक करके वे सब मर गए तो मैं क्या लिखूँगा, कौन समझेगा। वैसे ही नई पीढ़ी के लोगों को मेरी हिंदी कभी अबूझ, कभी अटपटी लगती है।” शब्दों के महिमा भी वह गाते हैं और साथ ही यह भी कहते हैं कि आपका शब्द-ज्ञान आपके अनुभव पर निर्भर करता है। “आप उतने ही शब्द जानते हैं जितनी आपने दुनिया देखी है। शब्द-भंडार और अनुभव-संसार बिल्कुल समानुपाती होते हैं। अनुभव संसार का मतलब स्थूल अनुभव से नहीं है, इसमें वह सब शामिल है जो आपने पढ़ा-सुना-देखा-जाना है। अगर लिखते या बोलते समय शब्दों की कमी महसूस हो रही है तो इसके दो ही मतलब हैं–या तो अभी जीवन भरपूर नहीं जिया है या ग्राह्यता में कुछ कमी रह गई है। शब्द और विचार एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते, विचारों में जितनी विविधता जितनी जटिलता होगी उन्हें व्यक्त करने के लिए आपको उतने ही बहुविध शब्दों की ज़रूरत होगी। अगर जीवन में घूमने-फिरने-खाने-पीने-देखने-सुनने-लिखने-पढ़ने-अनुभवी लोगों से मिलने-जुलने के अनुभव कम हैं तो आपके पास शब्द भी कम होंगे।” हिन्दी भाषा की हालत और अंग्रेजी के बरअक्स हिन्दी के विकास से जुड़े सवालों पर अनामदास ने श्रृंखलाबद्ध ढंग से कई लेख लिखे हैं, जिनमें भाषा संबंधी उनका चिंतन अलग-अलग आयामों में सामने आता है। ईमानदार भ्रम अनामदास एकाधिक बार इस बात का जिक्र करते हैं कि कई मुद्दों पर वह भ्रम की स्थिति में हैं। वह एकपक्षीय तर्क देकर सत्य के किसी एक पहलू को दिखाने का प्रयास नहीं करते। सोच की यह ईमानदारी उनके लेखन में भी दिखती है। वह ईश्वर, भूत-प्रेत आदि विषयों पर लिखते समय अपने भ्रमित होने की बात स्वीकारते हैं — “अस्ति (है), नास्ति (नहीं है) के मत-मतांतर पर बहुत मंथन हो चुका है, लेकिन बेचारे भ्रमित के पास भी बहुत कुछ कहने को है ईश्वर के बारे में, मगर उसकी सुनता कौन है? फ़ितरतन लोग अपनी पसंद का जवाब चाहते हैं, आस्तिक सुनना चाहता है ईश्वर है और नास्तिक उसका उल्टा। मैं बिना किसी भ्रम के कहना चाहता हूँ कि मैं भ्रमित हूँ क्योंकि मुझ जैसों को भरमाने में कोई क़सर बाक़ी नहीं छोड़ी है शास्त्रों, शास्त्रियों और अनीश्वरवादियों ने भी। मौजूदा स्थिति ये है कि जब मुसीबत होती है तो भगवान याद आता है वर्ना उसके होने और न होने के तर्क दिमाग़ को मथते हैं।” “अस्तु, न मैं आस्तिक हूँ, न नास्तिक हूँ, भ्रमित हूँ। मुझे मेरे भ्रम से ईश्वर ही निकाल सकता है, और वह ऐसा करेगा इसके आसार नहीं है।” अपने परिचय में ही वह अपने भ्रमित होने की बात सरेआम स्वीकार कर चुके हैं। आत्मकथात्मक तत्व ऐसा लगता है कि बीते दिनों की रोचक यादें उन्हें बार-बार अपने अतीत में ले जाती हैं। इसलिए अपने लेखों में कभी-कभार वह अपनी जीवन कथा के बारे में भी लिखते रहते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए कहीं भी आत्ममुग्धता नज़र नहीं आती। वह पत्रकार क्यों बने इस बारे में वह सहज तरीके से कहते हैं — “नींबू वाले ने जिस अख़बार पर बिछाकर नींबू बेचने के लिए रखे थे उसी पर पत्रकारिता के कोर्स का विज्ञापन छपा था…बात 16 वर्ष पुरानी है, आवेदन भेजने की आख़िरी तारीख़ को मेरी उस पर नज़र पड़ी थी। अगर न पड़ी होती तो कहीं सरकारी नौकरी कर रहा होता। आप कहेंगे फिर भी सब कुछ किया तो आपने ही न? नहीं, ऐसा नहीं है, मुझसे अधिक योग्य लोग सड़कों की खाक छान रहे हैं और बहुत अयोग्य लोग चाँदी काट रहे हैं। इसका कर्म और योग्यता से कम और संयोग से अधिक संबंध है, सही जगह पर सही समय पर होना नियति है। ग़लत जगह पर ग़लत समय पर होना भी।” वह आत्ममुग्ध होकर यह नहीं कहते मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ वरन् कहते हैं यह नियति है, संयोग है। शब्दों के प्रति उनकी दिलचस्पी अदभुत है। एक जगह वह लिखते हैं “पहले बिचड़ा बोया जाता है, फिर धान की रोपनी होती है, फ़सल पकने पर दाने निकलते हैं, दानों को चावल कहा जाता है, उन्हें खौलते पानी में डाला जाता है जिसे अदहन कहते हैं, जब दाने पक जाते हैं तो भात कहा जाता है. बहरहाल, हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए चावल की खेती होती है और हमारी थाली में भी चावल ही होता है।” “गोड़ाई, निराई, रोपनी, दँवरी, अधबँटाई, पगहा, रेहड़, जोहड़…अगर आपको ये शब्द नहीं मालूम तो आपकी खेती-किसानी में कोई दिलचस्पी नहीं है। इन शब्दों को जानने के लिए किसान होना ज़रूरी नहीं है। खेत से आपकी थाली तक अनाज कैसे पहुँचता है इसमें रुचि होना बहुत सहज है, लेकिन सबकी रुचि नहीं होती। करनी, साबल, खंती, गैंता, रंदा, बरमा जैसे शब्द अगर आपको नहीं मालूम इसका मतलब है कि आपके घर में मज़दूरों और बढ़ई ने कभी काम नहीं किया या फिर वे क्या करते हैं, क्यों करते हैं, कैसे करते हैं इसमें आपकी दिलचस्पी नहीं रही। कील, कवच, अर्गला, मारण, मोहन, उच्चाटन, संपुट आप नहीं जानते इसका मतलब है कि आपके घर में देवी की विधिवत पूजा कभी नहीं हुई, अगर हुई तो आपको पता नहीं चला कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, कैसे हो रहा है।” तार्किक विश्लेषण अनामदास के तर्कों की धार ऐसी है कि उनसे असहमत होना अक्सर कठिन होता है। वह गूढ़ से गूढ़ विषय को अपने तर्कों की पैनी धार से काटने की क्षमता रखते हैं। वह कहते भी हैं “बहस का मज़ा तर्क की धार में है, विशेषणों के प्रहार में नहीं।” अपने हिन्दुत्व पर गर्वान्वित होने की सोच पर टिप्पणी करते हुए एक जगह वह तर्कपूर्ण ढंग से कहते हैं: “हिंदू होने पर गर्व करना ग़लत है। ठीक उसी तरह जैसे अमीर बाप का बेटा होने पर गर्व करना। सीधा मतलब ये है कि जो आपका निर्णय नहीं है उस पर न तो आपको गर्व करने का अधिकार है और न ही उसके लिए आपको हीन माना जाना चाहिए। हिंदू होने के लिए आपने क्या किया है? आपके पुरखे मुसलमान, ईसाई, जैन या बौद्ध नहीं बने। इस पर आप क्यों इतराएँ? यह बात हर धर्म, जाति, वर्ग, देश के लोगों पर लागू होती है। अगर आपने पैदा होने से पहले एक फॉर्म भरकर कहा होता तो मुझे फलाँ देश में, फलाँ धर्म में, फलाँ जाति में, फलाँ परिवार में पैदा होना है… तो शायद आपके गर्व करने की बात कुछ समझ में आती। एक जैविक घटना और एक संयोग पर गर्व करना कैसे ठीक हो सकता है?” “क्या कौव्वे को काला कहने से पहले भैंस, हाथी से लेकर दुनिया के हर काले जानवर का नाम लेना ज़रूरी है?” उनके लेखों के कई उद्धरण काफी अच्छे बन पड़े हैं, एक झलक देखिए -

  • “पाकिस्तान या बांग्लादेश में इस्लाम की राजनीति उतनी ही ख़तरनाक है जितनी भारत में हिंदुत्व की राजनीति क्योंकि वहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हैं।”
  • “ईश्वर के अस्तित्व के सवाल पर वैज्ञानिकों को कायल करना उतना ही कठिन है जितना जॉर्ज बुश को इस्लाम स्वीकार करने के लिए राज़ी करना।”
  • “अनाम लोगों के संदेश को नाम वालों के मुक़ाबले ज़रा ज़्यादा ग़ौर से सुनना चाहिए क्योंकि उसमें संदेश प्रमुख होता है न कि उसे भेजने वाला। गुप्त मतदान के महत्व को लोकतंत्र में रहने के कारण आप अच्छी तरह समझते हैं। अनाम लोग अक्सर जनभावनाओं के प्रतिनिधि होते हैं, टीवी पर जो आदमी कहता है कि ‘महँगाई बहुत बढ़ गई है’ वह अनाम ही होता है। गुप्त टिप्पणी करने वाले को एक आम मतदाता समझने में क्या कष्ट है? जो सैकड़ों लोकगीत गाए जाते हैं उनका कोई कवि-गीतकार-शायर नहीं होता, कई बार जनमानस की भावनाओं को सुरों से अनाम लोग सजाते हैं।”
  • “सबसे दिलचस्प कमेंट वही करते हैं जो रामझरोखे बैठकर सबका मुजरा लेते हैं।”
  • “ईश्वर आस्था के ईंधन से चलता है और विज्ञान तर्क की टुटही बैसाखी पर, टुटही इसलिए कि तर्क वहीं तक साथ देता है जहाँ तक आप जानते हैं। जानने की सबसे बड़ी निशानी यही जानना है कि आप क्या-क्या नहीं जानते। ईश्वर क्या है, है या नहीं है, कैसा है… इसके बारे हम कितना जानते हैं?”
  • “भाषा सिर्फ़ माध्यम नहीं है, भाषा साबुत विचार है। शब्द भावना का वाहक नहीं, पूरी भावना है।”
  • “इग्नोरेंस इज़ ब्लिस’ सुना था लेकिन इस छोटी-सी बात में कितना गहन ज्ञान छिपा है यह मैं ज्ञान की चकाचौंध में समझ ही नहीं पाया। मैंने अपने जीवन में जितने लोगों को अज्ञानी समझकर हिकारत की नज़रों से देखा है, वे सब शर्तिया तौर पर मुझसे ज्यादा आनंदित हैं। ज्ञानी शहर के अंदेशे में दुबले होते हैं जबकि अज्ञानी आनंद के सागर में गोते लगाते हैं। बचपन से आज तक आपने देखा है, जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, आनंद कम होता जाता है।”